Friday, June 11, 2010

झुग्गी से निकला IAS हरीश चन्द्र !



झुग्गी
में रहने वाला एक लड़का बना आईएएस !जी हाँ यह सच है....है फक्र की बात..ये कारनामा कर दिखाया दिल्ली में 208 नंबर झुग्गी में रहने वाले हरीश चन्द्र ने..... सचमुच बहुत बड़ा काम कर दिखाया हरीश जी ने..केवल अपने लिए बल्कि समाज और पूरे देश के लिए ....रिजल्ट आने के दूसरे दिन जब हरीश जी हमारे न्यूज़ रूम में आये थे, और मेरे सीट के बगल में बैठे, मेरे जूनियर ने मुझे बताया की सर ये हैं आईएएस हरीश चन्द्र...!मैंने उनसे हाथ मिलाया और बधाई दी, यूपीएससी परीक्षा में पास होने पर..और पूछा क्या विषय थे? और कैसे तैयारी की ?उन्हूने सब कुछ बताया...दिल बहुत खुश हुआ, कोई इतनी गरीबी से पढ़कर इतने ऊंचे ओहदे पर पंहुचा है...इस बीच उनका थोड़ी देर में बुलेटिन में स्टूडियो से लाइव होना था....में फिर से न्यूज़ रूम में ख़बरों में ब्यस्त था....मन बहुत खुश था की कोई सख्स जो जमीन से जुड़ा हुआ है और इस मुकाम तक पहुचा...वो भी झुग्गी में रहते हुए..आप अंदाजा लगा सकते हैं झुग्गी की जिंदगी कैसी होती है..उन्हूने बताया की ये मेरा पहला और आंखिरी प्रयास था...क्यूंकि अगले प्रयास के लिए सायद माता पिता साथ नहीं दे पाते क्यूंकि गरीबी का जिन्न जो उनके दरवाजे पर कुंडली मारे बैठा हुआ था..लेकिन कहते हैं मेहनत कभी बेकार नहीं जाती.ऊपर वाला जब देता है छप्पर फाड़ कर देता है..वही हुआ..हरीश चन्द्र ने हार नहीं मानी हालातों से... और आज सर्बोच्च सीट पर बिराजमान है...में उनको देख कर एक पल तो हक्का-बक्का रह गया...लेकिन उनकी विल पॉवर देखकर गर्व भी हुआ...सबसे बड़ी बात झुग्गी से पले-बढे और इस मुकाम तक पहुचना बड़े फक्र की बात है...

दिल्ली की झुग्गी झोपडी में रहने वाले दिहाडी मजदूर के बेटे हरीश चंदर ने पहले प्रयास में तय किया आईएएस का सफर। यह कहानी है एक जिद की, यह दास्तां है एक जुनून की, यह कोशिश है सपने देखने और उन्हें पूरा करने की। यह मिसाल है उस जज्बे की, जिसमें झुग्गी बस्ती में रहते हुए एक दिहाडी मजदूर का बेटा आईएएस अफसर बन गया है। पिता एक दिहाडी मजदूर, मां दूसरों के घर-घर जाकर काम करने वाली बाई। कोई और होता तो शायद कभी का बिखर गया होता, लेकिन दिल्ली के 21 वर्षीय हरीश चंदर ने इन्हीं हालात में रहकर वह करिश्मा कर दिखाया, जो संघर्षशील युवाओं के लिए मिसाल बन गया। दिल्ली के ओट्रम लेन, किंग्सवे कैंप की झुग्गी नंबर 208 में रहने वाले हरीश ने पहले ही प्रयास में आईएएस परीक्षा में 309वीं रैंक हासिल की है। संघर्ष की सफलता की कहानी, हरीश चंदर की जुबानी।
मेरा बचपन: चने खाकर गुजारी रातें
मैंने संघर्ष की ऎसी काली कोठरी में जन्म लिया, जहां हर चीज के लिए जद्दोजहद करनी पडती थी। जब से मैंने होश संभाला खुद को किसी किसी लाइन में ही पाया। कभी पीने के पानी की लाइन में तो कभी राशन की लाइन में। यहां तक कि शौच जाने के लिए भी लाइन में लगना पडता था। झुग्गी में माहौल ऎसा होता था कि पढाई कि बात तो दूर सुबह-शाम का खाना मिल जाए, तो मुकद्दर की बात मानी जाती थी। बाबा (पापा) दिहाडी मजूदर थे। कभी कोई काम मिल जाए तो रोटी नसीब हो जाती थी, नहीं तो घर पर रखे चने खाकर सोने की हमें सभी को आदत थी। झुग्गी में जहां पीने को पानी मयस्सर नहीं होता वहां लाइट की सोचना भी बेमानी है। झोपडी की हालत ऎसी थी कि गर्मी में सूरज, बरसात में पानी और सर्दी में ठंड का सीधा सामना हुआ करता था।
मेरी हिम्मत: मां और बाबा
मेरे मां-बाबा पूरी तरह निरक्षर हैं, लेकिन उन्होंने मुझे और मेरे तीन भाई-बहनों को पढाने की हरसंभव कोशिश की। लेकिन जिस घर में दो जून का खाना जुटाने के लिए भी मशक्कत होती हो, वहां पढाई कहां तक चल पाती। घर के हालात देख मैं एक किराने की दुकान पर काम करने लगा। लेकिन इसका असर मेरी पढाई पर पडा। दसवीं में मैं फेल होते-होते बचा। उस दौरान एक बार तो मैंने हमेशा के लिए पढाई छोडने की सोच ली। लेकिन मेरी मां, जिन्हें खुद अक्षरों का ज्ञान नहीं था, वो जानती थीं के ये अक्षर ही उसके बेटे का भाग्य बदल सकते हैं। मां ने मुझे पढाने के लिए दुकान से हटाया और खुद दूसरों के घरों में झाडू-पोंछा करने लगी। उनके कमाए पैसों को पढाई में खर्च करने में भी मुझे एक अजीब सा जोश आता था। मैं एक-एक मिनट को भी इस्तेमाल करता था। मेरा मानना है कि आपको अगर किसी काम में पूरी तरह सफल होना है तो आपको उसके लिए पूरी तरह समर्पित होना पडेगा। एक प्रतिशत लापरवाही आपकी पूरी जिंदगी के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है।
मेरे प्रेरक : मां, गोविंद और धर्मेद्र सर
यूं तो मां मेरी सबसे बडी प्रेरणा रही है, लेकिन मैं जिस एक शख्स से सबसे ज्यादा प्रभावित हूं और जिसने मुझे झकझोर कर रख दिया, वह है गोविंद जायसवाल। वही गोविंद जिसके पिता रिक्शा चलाते थे और वह 2007 में आईएएस बना। एक अखबार में गोविंद का इंटरव्यू पढने के बाद मुझे लगा कि अगर वह आईएएस बन सकता है तो मैं क्यूं नहीं मैं बारहवीं तक यह भी नहीं जानता था कि आईएएस होते क्या हैं लेकिन हिंदू कॉलेज से बीए करने के दौरान मित्रों के जरिए जब मुझे इस सेवा के बारे में पता चला, उसी दौरान मैंने आईएएस बनने का मानस बना लिया था। परीक्षा के दौरान राजनीतिक विज्ञान और दर्शन शास्त्र मेरे मुख्य विष्ाय थे। विष्ाय चयन के बाद दिल्ली स्थित पतंजली संस्थान के धर्मेद्र सर ने मेरा मार्गदर्शन किया। उनकी दर्शन शास्त्र पर जबरदस्त पकड है। उनका पढाने का तरीका ही कुछ ऎसा है कि सारे कॉन्सेप्ट खुद खुद क्लीयर होते चले जाते हैं। उनका मार्गदर्शन मुझे नहीं मिला होता तो शायद मैं यहां तक नहीं पहुंच पाता।
मेरा जुनून : हार की सोच भी दिमाग में आए
मैंने जिंदगी के हर मोड पर संघर्ष देखा है, लेकिन कभी परिस्थतियों से हार स्वीकार नहीं की। जब मां ने किराने की दुकान से हटा दिया, उसके बाद कई सालों तक मैंने बच्चों को टयूशन पढाया और खुद भी पढता रहा। इस दौरान जाने कितने लोगों की उपेक्षा झेली और कितनी ही मुसीबतों का सामना किया। लोग मुझे पास बिठाना भी पसंद नहीं करते थे, क्योंकि मैं झुग्गी से था। लोग यह मानते हैं कि झुग्गियों से केवल अपराधी ही निकलते हैं। मेरी कोशिश ने यह साबित कर दिया कि झुग्गी से अफसर भी निकलते हैं। लोगों ने भले ही मुझे कमजोर माना लेकिन मैं खुद को बेस्ट मानता था। मेरा मानना है कि जब भी खुद पर संदेह हो तो अपने से नीचे वालों को देख लो, हिम्मत खुद खुद जाएगी। सही बात यह भी है कि यह मेरा पहला ही नहीं आखिरी प्रयास था। अगर मैं इस प्रयास में असफल हो जाता तो मेरे मां-बाबा के पास इतना पैसा नहीं था कि वे मुझे दोबारा तैयारी करवाते।
मेरी खुशी : बाबूजी का सम्मान
मेरी जिंदगी में सबसे बडा खुशी का पल वह था, जब हर दिन की तरह बाबा मजदूरी करके घर लौटे और उन्हें पता चला कि उनका बेटा आईएएस परीक्षा में पास हो गया है। मुझे फख्र है कि मुझे ऎसे मां-बाप मिले, जिन्होंने हमें कामयाबी दिलाने के लिया अपना सबकुछ होम कर दिया। मुझे आज यह बताते हुए फख्र हो रहा है कि मेरा पता ओट्रम लेन, किंग्सवे कैंप, झुग्गी नंबर 208 है। उस दिन जब टीवी चैनल वाले, पत्रकार बाबा की बाइट ले रहे थे तो उनकी आंसू भरी मुस्कुराहट के सामने मानों मेरी सारी तकलीफें और मेहनत बहुत बौनी हो गई थीं।
मेरा संदेश : विल पावर को कमजोर मत होने दो
मेरा मानना है कि एक कामयाब और एक निराश व्यक्ति में ज्ञान का फर्क नहीं होता, फर्क होता है तो सिर्फ इच्छाशक्ति का। हालात कितने ही बुरे हों, घनघोर गरीबी हो। बावजूद इसके आपकी विल पावर मजबूत हो, आप पर हर हाल में कामयाब होने की सनक सवार हो, तो दुनिया की कोई ताकत आपको सफल होने से रोक नहीं सकती। वैसे भी जब हम कठिन कार्यो को चुनौती के रूप में स्वीकार करते हैं और उन्हें खुशी और उत्साह से करते हैं तो चमत्कार होते हैं। यूं तो हताशा-निराशा कभी मुझपर हावी नहीं हुई, लेकिन फिर भी कभी परेशान होता था तो नीरज की वो पंक्तियां मुझे हौसला देती हैं, 'मैं तूफानों में चलने का आदी हूं.. '....सच में काबिले तारीफ....!समाज के कमजोर वर्ग के लोगों के लिए प्रोत्साहित करने का उम्दा उदाहरण प्रस्तुत किया है हरीश चन्द्र ने !मेरी ओर से एक बार फिर से उनको हार्दिक बधाई......

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